“मन सभी मानसिक अवस्थाओं का प्रधान है, मन ही श्रेष्ठ है और वे सब मन से ही उत्पन्न होते हैं। यदि कोई व्यक्ति प्रसन्न व शुद्ध मन से बोलता या कार्य करता है, तो सुख उसकी कभी न बिछड़ने वाली छाया की तरह उसके पीछे चल…”
पूर्ण संदर्भ देखें →तथागत गौतम बुद्ध
शाक्यमुनि बुद्ध, धम्म के संस्थापक
बौद्ध धर्म के संस्थापक जिन्होंने प्रज्ञा, शील और करुणा के माध्यम से मानवता को आत्म-जागरण और सदाचार का अमर संदेश दिया।
प्रामाणिक विचार संग्रह (70)
“इस संसार में वैर से कभी वैर शांत नहीं होता; अवैर (मैत्री व प्रेम) से ही वैर शांत होता है। यही सनातन और शाश्वत नियम है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“व्यर्थ के हजार शब्दों से वह एक सार्थक शब्द श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर मन को शांति प्राप्त होती है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जिस प्रकार एक ठोस चट्टान वायु के झोंकों से नहीं हिलती, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष प्रशंसा या निंदा से विचलित नहीं होते।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“समस्त संसार के प्रति असीम मैत्री और प्रेम का विस्तार करो — ऊपर, नीचे और चारों ओर — बिना किसी बाधा, बिना किसी द्वेष और बिना किसी शत्रुता के।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जीवों को हानि पहुँचाने वाला व्यक्ति कभी 'आर्य' (श्रेष्ठ/महान) नहीं कहलाता। जो सभी प्राणियों के प्रति अहिंसक व दयालु है, वही आर्य कहलाता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“तृष्णा से शोक उत्पन्न होता है, तृष्णा से भय उत्पन्न होता है। जो तृष्णा से सर्वथा मुक्त है, उसके लिए न कोई शोक है और न कोई भय।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“केवल सुनी-सुनाई बातों पर, परंपराओं पर, अथवा धर्मग्रंथों में लिखे होने मात्र पर विश्वास मत करो... जब तुम स्वयं अपने विवेक से यह जान लो कि ये बातें कल्याणकारी, निर्दोष और ज्ञानियों द्वारा प्रशंसित हैं तथा सुख और शांति की…”
पूर्ण संदर्भ देखें →“मनुष्य स्वयं ही बुरा कर्म करता है और स्वयं ही दूषित होता है। मनुष्य स्वयं ही बुराई से बचता है और स्वयं ही शुद्ध होता है। शुद्धि और अशुद्धि अपने आप पर निर्भर है; कोई दूसरा किसी को शुद्ध नहीं कर सकता।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“युद्ध में भले ही कोई व्यक्ति लाखों शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ले, परंतु जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तव में सबसे महान विजेता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“आत्मदीपो भव (अपने दीपक स्वयं बनो)। अपनी शरण में स्वयं जाओ। किसी बाहरी सहारे की खोज मत करो। धम्म को अपना दीपक और अपनी शरण बनाओ।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जन्म से कोई अछूत या हीन नहीं होता, और न ही जन्म से कोई ब्राह्मण (श्रेष्ठ) होता है। अपने कर्मों से ही मनुष्य हीन बनता है और अपने कर्मों से ही मनुष्य श्रेष्ठ बनता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“सभी बुराइयों से बचना, कुशल (पुण्य) कार्यों को अर्जित करना और अपने मन को पूर्णतः शुद्ध करना — यही सभी बुद्धों की मूल शिक्षा है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“क्रोध को अक्रोध (प्रेम) से जीतो, दुष्टता को भलाई से जीतो, कंजूस को दान से जीतो, और असत्यवादी को सत्य से जीतो।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“पुण्य या भलाई को छोटा समझकर उसकी उपेक्षा मत करो कि 'यह मुझ तक नहीं आएगा।' बूँद-बूँद गिरने से घड़ा भर जाता है। उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति थोड़ा-थोड़ा करके भी अपने जीवन को अच्छाइयों से भर लेता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“आरोग्य (स्वास्थ्य) सबसे बड़ा लाभ है, संतोष सबसे बड़ा धन है, विश्वासपात्र मित्र सबसे बड़ा संबंधी है, और निर्वाण परम सुख है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“अतीत में मत उलझो, भविष्य के सपने मत देखो, अपने मन को वर्तमान क्षण पर केंद्रित करो। जो कार्य आज करना है, उसे आज ही पूरी सजगता से करो।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“तीन चीजें लंबे समय तक छिपी नहीं रह सकतीं: सूर्य, चंद्रमा, और सत्य।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जिस प्रकार एक माँ अपने एकमात्र बच्चे की रक्षा अपने प्राणों की बाजी लगाकर करती है, उसी प्रकार सभी जीवित प्राणियों के प्रति अपने हृदय में असीम मैत्री और करुणा का भाव विकसित करना चाहिए।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जो सदाचार और प्रज्ञा (विवेक) से संपन्न है, जो धर्मनिष्ठ और सत्यवादी है, और जो अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक करता है — ऐसे व्यक्ति को संपूर्ण संसार प्रिय मानता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“प्रयास आपको स्वयं करना होगा; बुद्ध केवल मार्गदर्शक हैं जो रास्ता दिखाते हैं। जो इस मार्ग पर चलकर ध्यान करते हैं, वे सभी बंधनों और दुखों से मुक्त हो जाते हैं।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जो धम्म के रस का पान करता है, वह शांत और प्रसन्न चित्त से सुखपूर्वक जीता है। ज्ञानी मनुष्य हमेशा आर्यों (श्रेष्ठ पुरुषों) द्वारा उद्घाटित धम्म में ही आनंद पाता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“व्यर्थ के शब्दों से युक्त सैकड़ों गाथाओं को दोहराने की तुलना में धम्म का एक ही पद अधिक श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर मनुष्य परम शांति को प्राप्त होता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“हम वैरियों के बीच भी वैर-रहित (मित्रतापूर्ण) होकर परम सुख से जीवन जीते हैं। जो लोग घृणा और द्वेष से ग्रस्त हैं, उनके बीच भी हम घृणा-मुक्त होकर रहते हैं।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“'सभी संस्कार (उत्पन्न वस्तुएं) अनित्य (परिवर्तनशील) हैं' — जब कोई प्रज्ञा (विवेक) से इसे देखता है, तब वह दुःखों से विरक्त हो जाता है। यही शुद्धि और मुक्ति का मार्ग है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी और रक्षक है; भला कोई दूसरा उसका स्वामी कैसे हो सकता है? जब व्यक्ति स्वयं को पूर्णतः वश में कर लेता है, तो वह ऐसा दुर्लभ संरक्षण पा लेता है जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलता।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“केवल वही वाणी बोलो जो हितकारी हो, जिससे स्वयं को कोई पश्चाताप न हो, और जो दूसरों को सुख पहुँचाए। सत्य बोलो और स्नेह से युक्त वाणी बोलो।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जीत से वैर और द्वेष उत्पन्न होता है, क्योंकि पराजित व्यक्ति दुःख में जीता है। जो व्यक्ति विजय और पराजय दोनों का त्याग कर देता है, वह शांत और परम सुखी रहता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“धैर्य और सहनशीलता ही परम तपस्या है। बुद्ध कहते हैं कि 'निर्वाण ही परम पद है।' जो दूसरों को आघात पहुँचाता है वह प्रव्रजित (संन्यासी) नहीं है; जो दूसरों को सताता है वह श्रमण नहीं है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“राग (लोभ/आसक्ति) के समान कोई अग्नि नहीं है, द्वेष (घृणा) के समान कोई पाप नहीं है, शरीर-मन के बंधनों के समान कोई दुःख नहीं है, और आंतरिक शांति से बढ़कर कोई सुख नहीं है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जिस प्रकार विशाल महासागर का केवल एक ही स्वाद है — नमक का स्वाद; उसी प्रकार इस धम्म और विनय का भी केवल एक ही स्वाद है — विमुक्ति (स्वतंत्रता) का स्वाद।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जैसे गहरा सरोवर बिल्कुल स्वच्छ, शांत और अविचल होता है, उसी प्रकार धम्म के वचनों को सुनकर ज्ञानी और बुद्धिमान जन पूर्णतः शांत और प्रसन्न हो जाते हैं।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“बहुत अधिक बोलने मात्र से कोई व्यक्ति ज्ञानी (विद्वान) नहीं हो जाता। जो सहनशील, द्वेषरहित और निर्भय है, वास्तव में वही सच्चा ज्ञानी कहलाता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“इस जीवन में किए गए सत्कर्म और सदाचार ही एकमात्र ऐसा सच्चा धन हैं जो प्राणी के साथ चलते हैं, और एक कभी न छोड़ने वाले सच्चे साथी की तरह सदैव साथ रहते हैं।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जैसे किसी वृक्ष को काट दिए जाने पर भी, यदि उसकी जड़ें सुरक्षित रहें, तो वह पुनः अंकुरित हो जाता है; उसी प्रकार जब तक तृष्णा (आसक्ति) को जड़ से समाप्त नहीं किया जाता, तब तक यह दुःख बार-बार उत्पन्न होता रहता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जो कुछ प्राप्त हुआ है उसका तिरस्कार मत करो, और दूसरों की उन्नति या लाभ से ईर्ष्या मत करो। जो दूसरों से ईर्ष्या करता है, उसका चित्त कभी शांत नहीं हो सकता।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“बुराइयों से विरत रहो, अच्छाइयों को अपनाओ, और अपने हृदय को पूर्णतः निर्मल करो: यही आत्म-जागरण और मुक्ति का श्रेष्ठ मार्ग है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जिस प्रकार गंगा, यमुना जैसी महान नदियाँ महासागर में पहुँचकर अपने पूर्व नाम और पहचान खो देती हैं और केवल 'महासागर' कहलाती हैं; उसी प्रकार सभी जातियों और वर्गों के लोग जब इस धम्म में प्रवेश करते हैं, तो वे…”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जो परिश्रमी है, स्मृतिवान (सजग) है, कर्मों में पवित्र है, विचारशील है, संयमी है, और धम्म के अनुसार जीवन जीने वाला तथा अप्रमादी है — ऐसे व्यक्ति का यश और सम्मान निरंतर बढ़ता रहता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“मनुष्य स्वयं ही बुरा कर्म करता है और स्वयं ही कलुषित होता है। मनुष्य स्वयं ही बुराई से दूर रहता है और स्वयं ही शुद्ध होता है। शुद्धि और अशुद्धि अपने ही कर्मों पर निर्भर करती है; कोई दूसरा किसी को शुद्ध नहीं कर सकता।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“मन बहुत ही चंचल, तीव्र और जहाँ चाहे वहाँ भटक जाने वाला होता है। इसे वश में करना कठिन है, लेकिन एक संयमित और अनुशासित मन ही सच्चा सुख प्रदान करता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“हजारों व्यर्थ के शब्दों से युक्त भाषण की तुलना में अर्थपूर्ण और हितकारी एक ही शब्द अधिक श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर चित्त शांत और निर्मल हो जाता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“समस्त संसार के प्रति — ऊपर, नीचे और चारों दिशाओं में — असीम प्रेम और मैत्री का प्रसार करो, जो किसी भी रुकावट, द्वेष और शत्रुता से पूर्णतः मुक्त हो।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“नहर बनाने वाले पानी को अपनी इच्छानुसार मोड़ते हैं; तीर बनाने वाले तीर को सीधा करते हैं; बढ़ई लकड़ी को तराशते हैं; और ज्ञानी जन स्वयं को अनुशासित तथा संयमित करते हैं।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“दुष्ट और अनैतिक मित्रों की संगति मत करो, न ही नीच विचार वालों के साथ रहो। सदाचारी और कल्याणकारी मित्रों की संगति करो, और श्रेष्ठ व्यक्तियों के साथ रहो।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जैसे खराब छप्पर वाले घर में वर्षा का पानी टपक पड़ता है, वैसे ही असंयमित और अशिक्षित मन में वासनाएँ प्रवेश कर जाती हैं। और जैसे अच्छे छप्पर वाले घर में पानी नहीं टपकता, वैसे ही सुसंस्कृत मन में विकार प्रवेश नहीं…”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जो अपनी रक्षा करता है, वह दूसरों की भी रक्षा करता है; और जो दूसरों की रक्षा करता है, वह अपनी भी रक्षा करता है। सजगता और आंतरिक शांति विकसित करके व्यक्ति अपनी रक्षा करता है; और धैर्य, अहिंसा, प्रेम तथा करु…”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जो व्यक्ति सुख चाहने वाले अन्य प्राणियों को सताकर और उन पर अत्याचार करके अपने लिए सुख की तलाश करता है, वह कभी भी सच्चा सुख और शांति नहीं पा सकता।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“सभी जीव हिंसा से कांपते हैं; जीवन सभी को प्रिय है। स्वयं को दूसरों के स्थान पर रखकर देखो, और न तो किसी की हत्या करो और न ही हत्या का कारण बनो।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“नेत्रों में संयम अच्छा है; कानों में संयम अच्छा है; नासिका में संयम अच्छा है; और जिह्वा (वाणी) में संयम अच्छा है। सभी बातों में संयम कल्याणकारी है। जो सब प्रकार से संयमित है, वह समस्त दुखों से मुक्त हो जाता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“संसार में अज्ञानता से बढ़कर कोई अन्य बुरा विकार नहीं है; अविद्या ही सबसे बड़ा मैल है। इस अविद्या को त्यागकर निर्मल और बंधनमुक्त बनो।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“लाभ और हानि, सुख और दुःख, प्रशंसा और निंदा, यश और अपयश: ये आठ लोकधर्म संसार में निरंतर घूमते रहते हैं। ज्ञानी व्यक्ति इनकी अनित्य प्रकृति को समझकर शांत और अडिग रहते हैं।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जो वचन सत्य, तथ्यपूर्ण, हितकारी और दूसरों को प्रिय लगने वाला हो, उसे उचित समय पर ही बोला जाता है। यदि कोई बात सच भी हो, लेकिन वह दूसरों के लिए अहितकर और अनुपयोगी हो, तो बुद्ध उसे कभी नहीं बोलते।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जिस प्रकार एक ठोस विशाल पर्वत आंधी-तूफान से नहीं डोलता, उसी प्रकार प्रज्ञावान व्यक्ति प्रशंसा या निंदा से कभी विचलित नहीं होते।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“आकाश में कोई पदचिह्न नहीं होता, और सच्चा साधक अपनी मुक्ति के लिए बाहर नहीं बल्कि अपने भीतर देखता है। संसार सांसारिक बंधनों में आनंद लेता है, जबकि तथागत सभी बंधनों से मुक्त होते हैं।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“तुम स्वयं ही अपने रक्षक हो; तुम स्वयं ही अपनी शरण हो। इसलिए स्वयं को उसी प्रकार प्रशिक्षित करो जैसे एक कुशल व्यापारी उत्तम नस्ल के घोड़े को प्रशिक्षित करता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“उदारता (दान), प्रिय एवं मधुर वाणी, दूसरों की निस्वार्थ सेवा, और सभी के साथ समता व आदर का व्यवहार: ये चार सद्गुण समाज को उसी प्रकार जोड़े रखते हैं जैसे धुरी की कील चलते हुए रथ के पहियों को बांधे रखती है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“यदि आपको कोई ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति मिले जो आपके दोषों को दर्शाए और आपको सुधारे, तो उस मार्गदर्शक की संगति उसी प्रकार करें जैसे छिपे हुए खजाने का पता बताने वाले की की जाती है। ऐसे ज्ञानी का साथ हमेशा कल्याणकारी होता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“दूसरों के दोषों को मत देखो, और न ही इस बात पर ध्यान दो कि उन्होंने क्या किया या क्या नहीं किया। बल्कि अपने स्वयं के आचरण को देखो कि तुमने क्या किया और क्या नहीं किया।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जिस प्रकार रंग-बिरंगा और सुंदर फूल यदि सुगंधहीन हो तो व्यर्थ लगता है, उसी प्रकार उस व्यक्ति की सुंदर और ज्ञानभरी बातें भी निष्फल होती हैं जो स्वयं उन पर आचरण नहीं करता।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जिस प्रकार रंग-बिरंगा और सुगंध से भरपूर फूल सभी को आनंद देता है, उसी प्रकार उस व्यक्ति की सुंदर और ज्ञानभरी बातें भी अत्यंत फलदायी होती हैं जो स्वयं उन पर पूरी निष्ठा से आचरण करता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जो व्यक्ति उमड़ते हुए क्रोध को उसी प्रकार रोक लेता है जैसे तेज दौड़ते हुए रथ को नियंत्रित किया जाता है, उसे ही मैं सच्चा सारथी कहता हूँ; अन्य लोग तो केवल लगाम पकड़ने वाले हैं।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“सत्य बोलो; क्रोध के आगे मत झुको; और मांगने वाले को दो, चाहे तुम्हारे पास थोड़ा ही क्यों न हो। इन तीन सद्गुणों से व्यक्ति श्रेष्ठता और दिव्यता को प्राप्त होता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“न आकाश में, न समुद्र के बीच में, और न ही पर्वत की गुफाओं में प्रवेश करने पर — इस पृथ्वी पर ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ जाकर मनुष्य अपने बुरे कर्मों के परिणामों से बच सके।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“भले ही कोई व्यक्ति बिना प्रज्ञा और बिना आत्म-संयम के सौ वर्ष तक जिए, उसकी तुलना में प्रज्ञावान होकर और ध्यानमयी सजगता के साथ जिया गया एक ही दिन अत्यंत श्रेष्ठ है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“सजगता (अप्रमाद) अमरत्व का मार्ग है; और प्रमाद (लापरवाही) मृत्यु का मार्ग है। जो सजग और जागरूक हैं वे कभी नहीं मरते, जबकि लापरवाह लोग जीवित होते हुए भी मृत के समान हैं।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“जिस प्रकार सीमा पर स्थित नगर की भीतर और बाहर से भली-भांति रक्षा की जाती है, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने मन की रक्षा करनी चाहिए। इस बहुमूल्य अवसर को अपने हाथ से व्यर्थ न जाने दो।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“हे साधकों! एक ऐसी अवस्था है जो अजन्मी, अनुत्पन्न, अकृत और असंस्कृत (शर्तहीन) है। यदि वह अजन्मी, अनुत्पन्न, अकृत और असंस्कृत अवस्था न होती, तो इस संसार में जो जन्मा, उत्पन्न, बना और शर्तों से बंधा है, उससे मुक्ति…”
पूर्ण संदर्भ देखें →“विजय वैर और शत्रुता को जन्म देती है, क्योंकि पराजित व्यक्ति दुःख में जीता है। जो व्यक्ति विजय और पराजय दोनों की लालसा को त्याग देता है, वह शांत और सुखी जीवन व्यतीत करता है।”
पूर्ण संदर्भ देखें →“संसार में जितने भी प्राणी हैं — चाहे वे दुर्बल हों या बलवान, लंबे हों, मध्यम हों या छोटे, सूक्ष्म हों या विशाल, दिखाई देने वाले हों या अदृश्य, निकट रहते हों या दूर, जो जन्म ले चुके हैं या जो जन्म लेने वाले हैं — सभी प्राणी बि…”
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