विचार संग्रह

डॉ. बी. आर. आंबेडकर

भारतीय संविधान के निर्माता एवं महान समाज सुधारक

मानवाधिकारों के पुरोधा, भारतीय संविधान के शिल्पकार और स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुता के अग्रदूत जिनके विचार समाज को नई दिशा देते हैं।

प्रामाणिक विचार संग्रह (72)

BAWS Vol. XI, p. 979

“राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता जब तक कि उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो। सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है जीवन का एक ऐसा तरीका जो स्वतंत्रता, समता और बंधुता को जीवन के सिद्धांतों के रू…”

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Thoughts on Education and Intellect (1979 (Compilation))

“बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।”

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Annihilation of Caste with a Reply to Mahatma Gandhi, p. 57

“समानता भले ही एक कल्पना हो, फिर भी इसे एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में स्वीकार करना ही चाहिए।”

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BAWS Vol. VII, p. 38

“संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है। इसे विकसित करना पड़ता है। हमें यह महसूस करना होगा कि हमारे लोगों को इसे अभी सीखना बाकी है।”

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What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables, p. 240

“उदासीनता सबसे भयानक बीमारी है जो किसी समाज या लोगों को संक्रमित कर सकती है।”

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BAWS Vol. 1, p. 57

“लोकतंत्र केवल सरकार का एक रूप नहीं है। यह मूल रूप से सह-जीवन और साझा सामाजिक अनुभवों का एक तरीका है।”

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Address to the Depressed Classes Conference (1927)

“आत्म-सम्मान जीवन में सबसे महत्वपूर्ण कारक है। इसके बिना मनुष्य शून्य के समान है।”

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BAWS Vol. VII, p. 38

“भारत में लोकतंत्र केवल भारतीय धरती पर ऊपर से ओढ़ा हुआ एक आवरण है, जो मूल रूप से अलोकतांत्रिक है।”

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Popular Social Reform Slogan (Attributed) (Attributed period)

“शिक्षा शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह दहाड़े बिना नहीं रहेगा।”

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Selected Speeches and Philosophical Reflections (1950s)

“जो धर्म स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है, वही सच्चा धर्म है।”

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Annihilation of Caste / Speeches & Writings (1936)

“एक विचार को प्रसार की उतनी ही आवश्यकता होती है जितना कि एक पौधे को पानी की आवश्यकता होती है। नहीं तो दोनों मुरझाएंगे और मर जायेंगे।”

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Address to the Depressed Classes Conference (1930s)

“हमें अपने पैरों पर खड़ा होना होगा और अपने अधिकारों के लिए अपनी पूरी शक्ति से संघर्ष करना होगा।”

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BAWS Vol. 1, p. 213

“एक महान व्यक्ति एक प्रख्यात व्यक्ति से एक ही बिंदु पर भिन्न हैं कि महान व्यक्ति समाज का सेवक बनने के लिए तत्पर रहता हैं।”

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BAWS Vol. 1, p. 39

“राजनीतिक अत्याचार, सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है। समाज को चुनौती देने वाले सुधारक सरकार को नकारने वाले राजनेता की तुलना में अधिक साहसी व्यक्ति हैं।”

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BAWS Vol. 1, p. 40

“जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक कानून द्वारा प्रदान की गई कोई भी स्वतंत्रता आपके किसी काम की नहीं है।”

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BAWS Vol. 1, p. 222

“अधिकार केवल कानून द्वारा संरक्षित नहीं होते, बल्कि समाज की सामाजिक और नैतिक चेतना द्वारा संरक्षित होते हैं।”

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Address on Individual Liberty and Social Development (1940s)

“पानी की एक बूँद के विपरीत जो समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती है, मनुष्य जिस समाज में रहता है उसमें अपना अस्तित्व नहीं खोता।”

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Selected Speeches and Philosophical Essays (1940s)

“मैं किसी भी समूह या संस्था की तुलना में व्यक्ति की पवित्रता और गरिमा को प्राथमिकता देता हूँ।”

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Annihilation of Caste (1936)

“इतिहास गवाह हैं कि जहाँ नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच संघर्ष होता है वहां जीत हमेशा अर्थशास्त्र की होती है। निहित स्वार्थों को तब तक स्वेच्छा से नहीं छोड़ा गया है जब तक कि मजबूर करने के लिए पर्याप्त बल ना लगाया गया हो।”

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BAWS Vol. 17 (Part III), p. 123

“मैं एक हिंदू के रूप में पैदा हुआ क्योंकि इस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं था, लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं, यह मेरे वश में है।”

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BAWS Vol. 1, p. 27

“जाति व्यवस्था केवल श्रम का विभाजन नहीं है, बल्कि यह श्रमिकों का भी विभाजन है।”

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BAWS Vol. 1, p. 47

“आप जिस किसी भी दिशा में मुड़ें, जाति वह राक्षस है जो आपके रास्ते में आड़े आता है। जब तक आप इस राक्षस को नहीं मारते, तब तक कोई राजनीतिक या आर्थिक सुधार संभव नहीं है।”

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BAWS Vol. 11, p. 222

“बुद्ध की शिक्षाएँ शाश्वत हैं, फिर भी बुद्ध ने कभी यह दावा नहीं किया कि उनकी शिक्षा अकाट्य है अथवा बिना विवेक के सर्वकालिक बाध्यकारी है।”

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Address in the Constituent Assembly of India (1949)

“हमें यह स्वतंत्रता किसलिए चाहिए? हमें यह स्वतंत्रता अपनी सामाजिक व्यवस्था में सुधार करने के लिए चाहिए, जो असमानता, भेदभाव और अन्य बातों से भरी है, जो हमारे मौलिक अधिकारों के प्रतिकूल हैं।”

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Address to the Depressed Classes Women's Conference (1942)

“पति और पत्नी के बीच का संबंध सबसे घनिष्ठ मित्रों जैसा होना चाहिए।”

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BAWS Vol. 3, p. 25

“किसी समाज और उसके धर्म का निर्णय सामाजिक उपयोगिता और सामाजिक न्याय पर आधारित सामाजिक मानदंडों के अनुसार ही किया जाना चाहिए। इसके अलावा कोई अन्य पैमाना उपयोगी नहीं है।”

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BAWS Vol. 1, p. 78

“मैं हिंदू धर्म की उस व्यवस्था के विरुद्ध हूँ जो चातुर्वर्ण्य (जाति व्यवस्था), शास्त्रों और स्मृतियों के आडंबरों पर आधारित है — यही वास्तविक शत्रु है।”

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BAWS Vol. 1, p. 15

“समाज हमेशा विभिन्न वर्गों से बना होता है, और उनके बीच हितों का टकराव — चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक — यही एक मूलभूत वास्तविकता है।”

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Thoughts on Education and Intellect (1979 (Compilation))

“यह नहीं भूलना चाहिए कि बुद्धिमत्ता एक दुर्लभ वस्तु है। किसी भी अन्य सामाजिक पूंजी की तरह, इसका संवर्धन ही समाज का ध्येय होना चाहिए।”

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BAWS Vol. 3, p. 66

“न्याय ने हमेशा समानता और उचित प्रतिफल के विचारों को जागृत किया है। निष्पक्षता (equity) का अर्थ ही समानीकरण है।”

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BAWS Vol. I, p. 100

“मैं एक मजबूत केंद्र वाले एकीकृत भारत के पक्ष में हूँ ताकि भविष्य में किसी भी विभाजन या दरार की कोई गुंजाइश न रहे।”

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Address on Political Consciousness and Democratic Participation (1940s)

“राजनीति में हिस्सा ना लेने का सबसे बड़ा दंड यह है कि अयोग्य व्यक्ति आप पर शासन करने लगता है।”

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BAWS Vol. 1, p. 87

“हिंदू धर्म में, विवेक, कारण, और स्वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है।”

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Address at Ramlila Ground, Agra (1956)

“मैं बहुत मुश्किल से इस कारवां को इस स्थिति तक लाया हूं। यदि मेरे लोग, मेरे सेनापति इस कारवां को आगे नहीं ले जा सकें, तो पीछे भी मत जाने देना।”

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Address on the Dynamics of Social Revolution (1940s)

“एक सफल क्रांति के लिए सिर्फ असंतोष का होना ही काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए न्याय, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था का होना भी बहुत आवश्यक है।”

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BAWS Vol. 8, p. 36

“राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्तर भुलाकर उनमें सामाजिक भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाये।”

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Address on Historical Consciousness and Social Awakening (1930s)

“जो कौम अपना इतिहास नही जानती है, वह कौम कभी अपना इतिहास नही बना सकती है।”

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Selected Speeches and Philosophical Reflections (1940s)

“महान प्रयासों को छोड़कर इस दुनिया में कुछ भी बहुमूल्य नहीं है।”

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BAWS Vol. 11, p. 316

“कुछ लोग सोचते हैं कि धर्म समाज के लिए आवश्यक नहीं है। मैं यह दृष्टिकोण नहीं रखता। मैं धर्म की नींव को समाज के जीवन और प्रथाओं के लिए आवश्यक मानता हूं।”

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Annihilation of Caste / Speeches and Writings (1936)

“आप स्वाद को बदल सकते हैं पर जहर को अमृत में परिवर्तित नही किया जा सकता।”

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BAWS Vol. 17 (Part I), p. 3

“खोए हुए अधिकार कभी भी भीख मांगने या दया की याचना करने से वापस नहीं मिलते, बल्कि वे निरंतर और स्वाभिमानी संघर्ष से ही प्राप्त होते हैं।”

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BAWS Vol. 1, p. 56

“गुलामी का अर्थ केवल कानूनी रूप से अधीन होना नहीं है। इसका अर्थ समाज की वह स्थिति है जिसमें कुछ लोगों को अपने आचरण को नियंत्रित करने वाले उद्देश्यों को दूसरों से स्वीकार करने के लिए विवश किया जाता है।”

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Bahishkrit Bharat Editorial (1927)

“आत्मसम्मान (स्वाभिमान) जीवन की सबसे अमूल्य संपत्ति है। इसके बिना मनुष्य शून्य के समान है। आत्मसम्मान के साथ जीने के लिए व्यक्ति को सभी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।”

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Speech in the Constituent Assembly of India (1948)

“मैं नहीं चाहता कि भारतीयों के रूप में हमारी निष्ठा पर किसी भी अन्य प्रतिस्पर्धी निष्ठा का थोड़ा सा भी असर पड़े, चाहे वह निष्ठा हमारे धर्म, हमारी संस्कृति या हमारी भाषा से पैदा होती हो।”

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BAWS Vol. XI, p. 979

“धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है। लेकिन राजनीति में भक्ति या व्यक्ति-पूजा निश्चित रूप से पतन और अंततः तानाशाही की ओर ले जाने वाला सीधा रास्ता है।”

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Prospects of Democracy in India (1956)

“लोकतंत्र केवल कानूनों की सरकार नहीं है; यह अपने साथी नागरिकों के प्रति सम्मान और समानता का एक दृष्टिकोण है। अन्याय के प्रति उदासीनता किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए धीमे जहर के समान है।”

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Address to the Depressed Classes Students Conference (1938)

“ज्ञान मनुष्य के जीवन का सबसे मजबूत आधार है। ज्ञान को अपना हथियार और शिक्षा को अपनी ढाल बनाओ; इसके बिना व्यक्ति जीवन भर अंधकार में भटकता रहता है।”

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Debates in the Parliament of India (1951)

“कानून और व्यवस्था किसी भी राजनीतिक समाज के लिए औषधि के समान हैं, और जब राजनीतिक समाज अस्वस्थ होता है, तो न्याय और निष्पक्षता के साथ यह औषधि दी जानी चाहिए।”

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BAWS Vol. 1, p. 391

“संविधान का उद्देश्य केवल राज्य के अंगों का निर्माण करना नहीं है, बल्कि उनके अधिकारों को सीमित करना भी है, ताकि शासकों की निरंकुशता नागरिकों की स्वतंत्रता को नष्ट न कर सके।”

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BAWS Vol. XI, p. 979

“हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को एक सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना होगा। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक जीवित नहीं रह सकता जब तक कि उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो, जो स्वतंत्रता, समता और बंधुता को जीवन के मूल सिद्धां…”

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BAWS Vol. 1, p. 78

“जाति ईंटों की दीवार या कटीले तारों जैसी कोई भौतिक वस्तु नहीं है। जाति एक धारणा है; यह मन की एक अवस्था है। जाति के विनाश का अर्थ किसी भौतिक बाधा को तोड़ना नहीं, बल्कि मानसिक दृष्टिकोण में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना है।”

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BAWS Vol. 17 (Part III), p. 503

“मेरे सामाजिक दर्शन को तीन शब्दों में संजोया जा सकता है: स्वतंत्रता, समता और बंधुता। लेकिन कोई यह न कहे कि मैंने अपना यह दर्शन फ्रांसीसी क्रांति से लिया है। मैंने इसे वहाँ से नहीं लिया। मेरा यह दर्शन तथागत बुद्ध की शिक्षा…”

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BAWS Vol. 3, p. 45

“बदलती हुई दुनिया में अपरिवर्तनशील नैतिकता समाज को पतन और जड़ता की ओर ले जाती है। नैतिकता और सामाजिक नियमों को मानवीय न्याय और गरिमा की बढ़ती मांगों के अनुरूप विकसित होना चाहिए।”

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BAWS Vol. 17 (Part III), p. 283

“अपने बच्चों को बचपन से ही आत्मसम्मान और साहस की शिक्षा दें। उनके मन में यह दृढ़ विश्वास भरें कि वे इस दुनिया में किसी से भी कम नहीं हैं, और उन्हें किसी भी अन्याय के आगे झुकना नहीं है।”

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BAWS Vol. XI, p. 980

“बंधुता का अर्थ है सभी भारतीयों के बीच एक साझा भ्रातृत्व की भावना — यह भावना कि सभी भारतीय एक ही जनसमुदाय हैं। बंधुता के बिना, समता और स्वतंत्रता केवल ऊपरी रंग-रोगन से अधिक कुछ नहीं होंगी।”

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Annihilation of Caste / Philosophical Essays (1936)

“मानवीय स्वतंत्रता और गरिमा की खोज में, विवेक (तर्क) ही हमारा एकमात्र विश्वसनीय मार्गदर्शक है। रूढ़िवादिता, अंधपरंपराएँ और अनियंत्रित सत्ता ही मानवीय मुक्ति की सबसे बड़ी शत्रु हैं।”

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Bahishkrit Bharat Editorial (1928)

“अतीत के दुखों और कष्टों को निराशा या पछतावे के साथ मत देखो; बल्कि भविष्य की ओर अटूट संकल्प, एकता और साहस के साथ आगे बढ़ो।”

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Address on Social Justice and the Rule of Law (1940s)

“जो समाज अपने सबसे कमजोर सदस्यों के खिलाफ अन्याय की अनुमति देता है, वह अपनी नींव रेत पर बना रहा होता है। न्याय को निर्बलों की रक्षा करनी ही चाहिए, अन्यथा संपूर्ण सभ्यता नष्ट हो जाएगी।”

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BAWS Vol. 17 (Part III), p. 342

“किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति और उज्ज्वल भविष्य मुख्य रूप से उसके युवाओं की उच्च शिक्षा, नैतिक चरित्र और बौद्धिक स्वतंत्रता पर निर्भर करता है।”

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Address to the Depressed Classes Mass Rally (1930s)

“स्वावलंबन (स्वावलंबी बनना) ही सर्वोत्तम सहायता है। अपनी मुक्ति के लिए किसी अन्य पर निर्भर मत रहो। निरंतर परिश्रम, नैतिक अनुशासन और शिक्षा के द्वारा अपने भाग्य का निर्माण स्वयं करो।”

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BAWS Vol. 2, p. 505

“अस्पृश्यता ने अस्पृश्यों को बर्बाद किया है, इसने हिंदुओं को बर्बाद किया है, और अंततः इसने पूरे भारत को बर्बाद किया है। कोई भी राष्ट्र अपने ही लाखों नागरिकों की मानवता को कुचलकर कभी महान नहीं बन सकता।”

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BAWS Vol. 11, p. 320

“सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है, मन को शुद्ध करता है, सार्वभौमिक बंधुता को बढ़ावा देता है, और समाज में शांति तथा सद्भाव स्थापित करता है।”

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Address to the Depressed Classes Youth Conference (1930s)

“गरीबी या सामाजिक अभावों में जन्म लेना आपका दोष नहीं है, लेकिन गुलामी को अपनी नियति मानकर अधिकारों और आत्मसम्मान के लिए लड़े बिना मर जाना अक्षम्य विफलता है।”

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BAWS Vol. XI, p. 975

“संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग बुरे हों, तो वह निश्चित रूप से बुरा साबित होगा। और संविधान चाहे कितना भी बुरा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग अच्छे हों, तो वह अच्छा साबित हो…”

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Mooknayak (Leader of the Voiceless) Editorial (1920)

“सामाजिक मुक्ति के संघर्ष में विचार और सत्य ही सबसे अचूक हथियार हैं। मूक और शोषित जनता की चेतना को जगाना ही सभी वास्तविक क्रांतियों की शुरुआत है।”

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